साईं काका के उपदेश

मुख्य शब्दों के अर्थ

गुरू

“गु” से तात्पर्य अन्धकार तथा :”रू” से तात्पर्य प्रकाश होता है इस प्रकार सच्चे गुरू अपने शिष्य का अन्धकार दूर करते हैं तथा उसके जीवन में ज्ञान का प्रकाश भरते हैं। गुरू ईश्वरीय महिमा की शक्ति प्रदान करता है। गुरू कभी व्यक्ति नहीं होता बल्कि उस व्यक्ति के द्वारा ईश्वरीय महिमा शक्ति रूप में प्राप्त होती है। यह शक्ति वही उर्जा होती है जिससे विश्व की उत्पत्ति और वर्तमान स्वरूप व समर्थन उपलब्ध हुआ। गुरू प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर होता है आन्तरिक स्वयं के रूप में, वह कुछ भी नहीं होते हुए परम चैतन्य एवं परम आनन्द माना जाता है। वास्तविक गुरू उन गुरूओं की श्रेणी से आता है जिसकी स्थापना पराशिवा द्वारा हुई थी जिन्हें सर्वोच्च गुरू कहा जाता है। सच्चा गुरू स्वयं ज्ञान का प्रकाश स्तम्भ तो होता ही है साथ ही साथ वह अन्य व्यक्तियों के जीवन को प्रकाशवान बनाने का अनुभव भी रखता है। जिस प्रकार एक लपट से अनेकों दीप चल सकते हैं, उसी प्रकार एक गुरू की शक्ति से अनेकों शिष्यों के जीवन प्रकाशमय हो सकते हैँ।

“स्वयं”

विश्व में ‘स्वयं’ से महान कुछ भी नहीं है। समस्त सूक्ष्म वस्तुओँ में ‘स्वयं’ सबसे अधिक सूक्ष्म होता है। यह अत्यन्त गोपनीय और रहस्यमय होता है और इसका कोई नाम, कोई रंग अथवा रूप नहीं होता। हालांकि यह बिना किसी आकार के होता है, लेकिन संतो ने इसकी प्रकृति को सद्चिदानन्दा – अस्तित्वपूर्ण, परम चैतन्य एवं पूर्ण आनन्द का प्रतीक माना है। सत् का तात्पर्य पूर्ण सत्य, चित् अर्थात होश हवास, जिससे समस्त वस्तुयें प्रकाशवान होती हैं तथा आनन्द – प्रसन्नता की स्थिति को माना जाता है। हमारी सम्पूर्ण प्रसन्नतायें, प्रेरणायें तथा शक्ति ‘स्वयं’ से ही उत्पन्न होती है। वास्तव में ‘स्वयं’ शब्द में सम्पूर्ण विश्व समाया हुआ है। इसका अनुभव उस स्थिति में हो सकता है जब कि कोई व्यक्ति अपने अन्दर झांकता है और आराधना से ही उसे ज्ञान होता है। इस विश्व में ‘स्वयं’ सबसे अधिक प्रिय वस्तु माना जाता है, स्वयं को वह देखता है, स्वयं को वह सुनता है, स्वयं पर ही उसका ध्यान रहता है, स्वयं की वह आराधना करता है। स्वयं को अपने समक्ष रखो। स्वयं की आवश्यक प्रकृति को सुनने के पश्चात तथा स्वयं की आव्यक प्रकृति पर आराधना करते हुए एवं स्वयं की आवश्यक प्रकृति का ध्यान करते हुए, आपको सब कुथ मालूम हो जाएगा जो कुछ आप जानना चाहते हैं। स्वयं हमारे मस्तिष्क का साक्षी है। स्वयं ही वास्तविक भगवान है।

कुण्डलिनी शक्ति

आन्तरिक शक्ति, जोकि प्रत्येक मानव प्राणी में होती है और हमारे अन्दर जागृति होती है। यह कुण्डलिनी अनेकों नामों से जानी जाती है। चीन में इसे “ची” कहा जाता है। जापान में यह “की” नाम से जानी जाती है। ईसाइयों के शिलालेखों में इसे पवित्र आत्मा कहा जाता है। कुण्डलिनी ब्रह्मांड की शक्ति है जोकि इस प्रकृति की माता कही जाती है, वह सर्वोच्च शक्ति जिसके द्वारा प्रत्येक वस्तु का अस्तित्व बना हुआ है। इसे चिति के नाम से भी जाना जाता है, विश्व परमचैतन्य। कुण्डलिनी एक महत्वपूर्ण शक्ति है जिसके द्वारा शरीर में सब कार्य चलते रहते हैं। मानव शरीर में, यह मूलाधार चक्र पर आधारित है जोकि रीढ़ की हड्डी के नीचे स्थित रहती है। यहां से वे 72,000 नाड़ियों के जाल से वे हमारी समस्त आन्तरिक कार्यप्रणाली को चलाती और नियंत्रित करती है।

शक्तिपात

“सिद्धयोग में सिद्ध-गुरू एक दृष्टि, शब्द, स्पर्श या संकल्प के द्वारा शिष्य की सुप्त कुण्डलिनी-शक्ति को जगाने में कुशल होते हैं। इसको ‘शक्तिपात’ कहते हैं जिसके पश्चात इस महायोग की प्रक्रिया स्वत: आरम्भ हो जाती है जिसका मूल गुरूकृपा है।”

ध्यान

ध्यान एक प्राकृतिक साधना होती है और सभी सन्तों और साधुओँ के द्वारा इसे अपने आपको जानने और पाने का एक सीधा माध्यम बताया गया है। हम प्रतिदिन के जीवन में अपना ध्यान केन्द्रित करते हुए जो कुछ भी प्राप्त करते हैं, वह और कुछ नहीं बल्कि हमारा ध्यान ही है। यदि हम अपने आपको ध्यान की दिशा को अन्त:मुखी कर दें, तो हम अपने स्वयं का ही ध्यान करते रहेंगे। जिस प्रकार यदि हम अपने ध्यान को बाहरी दिशा में करते हैं तो हमारी दृष्टि में बाहरी दुनिया आ जाएगी। इसी प्रकार अपने अन्दर की ओर ध्यान केन्द्रित करने पर हमें आन्तरिक सत्य दिखाई देगा। ध्यान एक साधन है, जिसके द्वारा हम परम सत्य को देख पाते हैं। आन्तरिक सत्य पर अधिक से अधिक आराधना करने पर हम स्वयं सत्य बन जाएंगे। अपने स्वयं को सत्य का अनुभव करने हेतु, हमें अपनी एक जागरूकता के एक स्तर से दूसरे स्तर तक धीरे-धीरे और गहरे से गहरे स्तर पर पहुँचना होगा। सच्चा ध्यान हमारे मस्तिष्क को सम्पूर्ण एकाग्रता से ही संभव होती है।

सिद्ध योग

जब आन्तरिक कुण्डलिनी जागृत होती है तभी हमारी असली साधना शुरू होती है। जागृत होने के साथ वह हमारे अंदर कार्य करना आरम्भ करती है। हमारा मस्तिष्क अन्तर्मुखी हो जाता है और अपनी साधना के द्वारा आत्मा परमात्मा का मिलन हो जाता है और हमें मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

वह प्रक्रिया जिसमें सिद्ध गुरू के द्वारा शक्तिपात से कुण्डलिनी को जागृत किया जाता है, उसे सिद्ध योग अथवा महायोग कहा जाता है। सभी सिद्ध गुरू सिद्ध योग के मार्ग पर प्रशस्त होते हैं। सिद्ध गुरू परम्परा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के काल से है और गुरू के अपने शिष्य को अधिकार प्रदान किया जाता है। इस शक्ति को सौंपे जाने की प्रथा अखण्डित है और पूर्ण रूप से निरन्तर चलती जा रही है। शक्ति के सक्रिय होने के पश्चात अपने अन्त:करण में स्वयं ही प्रारम्भ हो जाता है।

जीवन दर्शन

बाबा मुक्तानंद के शांत होने के बाद से काका जी ने पूर्णत: परिव्राजक वृत्ति धारण कर ली। वे सतत् गतिमान रहते, रमता जोगी बहता पानी की तरह। कहीं भी अधिक दिन रूकते नहीं। इस प्रवज्या के दौरान उनका अनेक साधकों, जिज्ञासुओँ और मुमुक्षओं से मिलना होता। काका जी के व्यक्तित्व का सुफियाना अंदाज, होठों पर खेलती सौम्य मुस्कान, आत्मतृप्ति के तेज से चमकता संसार, आँखों से झरती किरणें, वाणी और व्यवहार से छलकता प्यार व अपनापन तथा बहुत घरेलू-सी दूधिया पोशाक- ये छवि रही कि जो भी उन्हें देखता प्रभावित हो जाता। उनके पूरे व्यक्तित्व में कोई आडम्बरी वैभव नहीं रहा, उनकी सादगी ही उनका वैभव रही और श्रद्धालुजन सहज ही इस वैभव के आगे नतमस्तक हो जाते, अपने मन के भेद उनके सामने खोल देते, अपनी आध्यात्मिक और सांसारिक शंकायें इस विश्वास के साथ प्रस्तुत करते कि उन्हें समाधान अवश्य मिलेगा और उन्हें समाधान मिलता भी। काका जी पर उनकी श्रद्धा, प्रीति, विश्वास दृढ़ होता। कोई-कोई अपने ह्रदय में उन्हें अपना गुरू भी धारण करता पर वे स्वयं ना किसी को दीक्षा देते और ना अपने आपको गुरू घोषित करते। बस सतत गतिमान रहते।

उत्तर काशी में साक्षात्कार के अऩुभव और फिर ज्ञानगंज से सम्पर्क के बाद काका जी के परिचित साधक समुदाय को अनायास ही कुछ परा अनुभव होने लगे। उन्हें अपने ध्यान और स्वप्न दृश्यों में काका जी के दर्शन होने लगे, उनसे संदेश, निर्देश, आदेश प्राप्त होने लगे। स्थूल और सूक्ष्म स्तर पर उन्हें सांसारिक व आध्यात्मिक समाधान प्राप्त होने लगा। कुछ श्रद्धालुजन उनसे गुरूदीक्षा देने का आग्रह करते और कोई-कोई उन्हें मठ या आश्रम स्थापित करने का सुझाव भी देता ताकि वे स्थायी रूप से काका जी के सम्पर्क में रह सकें, पर काका दोनों आग्रह दृढ़तापूर्वक टालते रहे।

सन 1987 की बात है, बाबा के शान्त होने के पाँच साल बाद, दिल्ली में काका जी का एक प्रेमी युवक उनसे बार-बार दीक्षा देने का आग्रह करने लगा। वह अपनी कुछ आध्यात्मिक और घरेलू समस्याओं से बहुत ज्यादा परेशान था। काका ने हर स्तर पर उसकी सहायता की लेकिन उसकी दीक्षा के आग्रह पर वे मौन हो जाते और वे युवक था कि एक ही रट लगाए था, “मुझे आपसे दीक्षा चाहिए….” अन्तत: काका को ना केवल उस युवक के लिए बल्कि अन्य सुयोग्य आकांक्षी साधकों को भी दीक्षा देने के लिए ज्ञानगंज से संदेश मिला और यूं दीक्षा का सिलसिला आरंभ हुआ।

कई बार ऐसा भी होता है कि किसी साधक को स्वप्न या ध्यान में संदेश मिल जाता है, तुम काका जी से दीक्षा लो और कभी-कभी किसी व्यक्ति को दीक्षा देने के लिए खुद काका को परासंदेश मिल जाता है तब वे दीक्षा दे देते है। उच्चतर संदेश मिले बिना वे प्राय: किसी को दीक्षा नहीं देते। आग्रहीजनों से वे कहते हैं “दीक्षा एक औपचारिकता है, गुरू-शिष्य का रिश्ता दिल से दिल का रिश्ता है- औपचारिकता नहीं”। प्राय: वे सभी से कहते हैं ‘ बंधो मत बांधो मत, मुक्त होओ, मुक्त रखो।‘

जो लोग काका जी को अपना गुरू मानते हैं, उनका उनसे स्पष्ट कहना होता है, गुरू व्यक्ति नहीं है, शक्ति है जो कि तुम्हारे भीतर है। बाह्य गुरू अन्तर गुरू को जगा देता है। आपकी अन्तर चेतना ही आपकी गुरू है।

उनकी दीक्षा भी कोई पारम्परिक अनुष्ठान या विधि नहीं होती। वे सब धर्मों का सार जानते हैं और हर किसी को उसकी आस्थाओं के अनुरूप साधना का निर्देश देते हैं तथा जैन धर्मावलम्बी को वे णमोकार मंत्र की साधना करने का निर्देश देते हैं तो मुस्लिम को कलमा-नमाज में नियमित रहने की सलाह देते हैं। सिख को मीरी-पीरी का रहस्य समझाते हैं और अमृत-छकने का भेद बताते हैं। आज उनके मानने वालों में सभी धर्मों, सभी पंथों के और सभी वर्ग व क्षेत्रों के लोग हैं।

काका जी के व्यक्तित्व में ये सबसे बड़ी खूबी है कि उनके प्रेमीजन उन्हें एक गुरू के रूप में तो कम वरन एक घरेलू बुजुर्ग या अभिभावक के रूप में अधिक स्वीकार करते हैं। उनको गुरू जी या स्वामी जी के रूप में कोई-कोई संबोधित करता है अन्यथा अधिकांश जन उन्हें बहुत ही घरेलू सम्बोधन ‘काका जी’ अथवा ‘आबा जी’ कह कर संबोधित करते हैं।

मराठी भाषा में ‘आबा’ बहुत ही प्रेमपूर्ण सम्मानीय सम्बोधन है। इस शब्द की उत्पत्ति उर्दू भाषा के ‘अब्बा’ या ‘अब्बू’ से जान पड़ती है जो कि सम्भवता: मुगलकाल में मराठी बोलचाल में शामिल हो गया होगा। यद्यपि उर्दू में ‘अब्बा’ शब्द पिता के लिए प्रयोग होता है लेकिन मराठी में ‘आबा’ सम्बोधन किसी भी सम्माननीय व्यक्ति के लिए समान रूप से प्रयोग किया जाता है – पिता के लिए, चाचा-ताऊ के लिए और बड़े भाई या वरिष्ठ मित्र के लिए भी।

मराठी के ‘आबा’ शब्द के बहुअर्थों की तरह की काका जी के व्यक्तित्व के बहुआयाम हैं कोई उनमें हितैषी सलाहकार देखता है तो कोई एक अच्छा मार्गदर्शक, किसी को वे मित्रवत जान पड़ते हैं तो कोई उन्हें अपना संरक्षक अथवा अभिभावक मानता है, किसी के लिए वे पूर्णरूपेण पिता हैं तो किसी को वे गुरू नजर आते हैं। वे सभी के व्यक्तिगत और विश्वसनीय हैं। यही नहीं वे शैवों को शैव दिखते हैं और शाक्तों को शाक्त तथा वैष्णवों को वैष्णव और तो और किसी-किसी को वे सूफी पीर-फकीर भी नजर आते हैं। जैसे जिसकी नज़र वैसा उनका रूप।

काका जी की सर्वप्रियता का एक बहुत बड़ा कारण है उनकी सादगी। वे गेरुए वस्त्र भी धारण नहीं करते। वे बड़े चुभते हुए शब्दों में कहते हैं ‘संन्यास अब काल-वाहि- आउट डेटेड – हो चुका है। वस्त्रों से संन्यास नहीं होता। वृत्ति-न्यास ही संन्यास है। जिनकी आश्रम और मठों में रूचि है उनसे वे बड़े अन्दाज से मुस्कुराते हुए कहते हैं, आश्रम भी धीरे-धीरे घर बन जाता है इसलिए अच्छा है कि घर को ही धीरे-धीरे आश्रम बनाओ। वहीं साधना करो’। वे कभी भी पलायन का उपदेश नहीं करते। घर-गृहस्थ वालों से कहते हैं, आखिर घर भी तो गृहस्थ आश्रम है। इस आश्रम पर ही बाकी के तीनों आश्रम आश्रित है। इस आश्रम में ही सिद्धों और संतों का जन्म होता है। लेकिन सिद्धों का जन्म साधना से होता है। इसलिए गृहस्थाश्रम की गंभीरता को समझो। ये सभी आश्रमों में श्रेष्ठतम है।

कोई युवा विद्धार्थी उनसे मंत्र या दीक्षा मांगता है तो वे कहते हैं ‘कम्प्यूटर पर काम करो और धन जमा कर पढाई करो। यही तुम्हारी साधना है। ये व्यवहार जगत में भी उतने ही कुशल हैं जितनी गरिमा से वे आध्यात्मिक जगत में रमण करते हैं। उनके शब्द बुद्धिजीवियों के मस्तक पर चोट करते हैं जब वे कहते हैं ‘ आप जिसे रूटीन- लाईफ कह रहे हैं उसमें लाईफ जैसी कोई चीज है भी क्या? एक नॉन-स्टॉप नॉनसेंस को आप लाईफ कह रहे हैं? नासमझी के इस अंतहीन चक्र को तोड़िए, अपने भीतर जाइए तब पता चलेगा कि जीवन किसे कहते हैं?’

यदि कोई तार्किक मेधा का व्यक्ति साईं काका से कहता है, मैं नास्तिक हूँ, मैं ईश्वर को स्वीकार नहीं करता तो वह बड़े सहज रूप से कहते हैं, ‘ईश्वर को स्वीकार या अस्वीकार करने से कोई आस्तिक अथवा नास्तिक नहीं होता। आस्तिक अथवा नास्तिक होता हैं स्वयं को स्वीकार या अस्वीकार करने से। नास्तिक वह नहीं है जो ईश्वर को स्वीकार नहीं करता, बल्कि नास्तिक वह है जो स्वयं को स्वीकार नहीं करता। और आगे कहते हैं, ‘आध्यात्म की राह पर चलने के लिए बस इतनी ही आस्था पर्याप्त है कि आपकी स्वयं पर आस्था हो…

उनकी बड़ी सरल-सी सिखावनी है, ज्ञान प्राप्त की प्राप्ति है। ज्ञान का आलोक तो आपको चारों तरफ से घेरे हुए हैं, कपाट को आपने बंद किए हुए हैं, उसे अन्दर आने का अवसर तो दीजिए, अपने कपाट को खोलिए। आपके अन्दर आलोक भर जाएगा, साधना है ही इसी का नाम- अपने कपाट खोलने का प्रयास। जिस दिन आपका कपाट खुलेगा, उस दिन विस्मय से नाच उठेंगे, दिखेगा कि कुछ भी बाहर से नहीं आया है, प्रकाश का एक बिन्दु है जो फूट कर सूरज हो गया है, फिर आपको अपनी प्रभा सब में दिखेगी, बस इसी का नाम ज्ञान है, स्वयं की प्रभा देखना और सब में उसी प्रभा को देखना…

ऱमण महर्षि से एक बार किसी ने पूछा कि साधना क्या है? तो उन्होंने जवाब दिया – साधना गधा है।

पूछने वाले ने पूछा – करनी क्यों चाहिए?

महर्षि ने जवाब दिया, ‘साधना नहीं करनी चाहिए, यह समझने के लिए साधना करनी चाहिए।

इसी तरह साईं काका भी कभी-कभी बड़े खरे जवाब देते हैं।

एक सज्जन ने पूछा – ईश्वर क्या है?

उन्होंने कहा – एक बीमारी है।

उसने पूछा – इस बीमारी की जड़? उ

उन्होंने मुस्कुरा कर कहा – आप।

फिर सवाल आया- और इलाज?

वे फिर मुस्कुराए और बोले – वह भी आप।

वह सज्जन चुप हो गए।

थोड़ी देर बार साईं काका ने मौन तोड़ा, कहा- ये गुरू और ईश्वर या भगवान आपकी सुख से भागने की आदत का आविष्कार है। आप खुद से भागते हैं तो भगवान की बात करते हैं, आप खुद से पलायन करते हैं तो गुरू को तलाशते हैं.. और एक बात मैं स्टाम्प पेपर पर लिख कर कह सकता हूँ कि कोई गुरू आपको कुछ दे नहीं सकता, आप लेने की क्षमता रखते हैं तो ले सकते हैं, आप में क्षमता है तो आप पत्थर से, पेड़ से, पत्ती से भी ले सकते हैं, उससे भी ले सकते हैं जो आपको देना ना चाहे, आप भिखारी की तरह माँगते मत फिरिए, अपने आप में लेने की क्षमता विकसित कीजिए, आपको मिल जाएगा.. आज तक पाया उसी ने जिसने खुदी को बुलन्द किया भिखारी भटकते रह गए।

धर्म के विषय में काका की जी मौलिक सोच है। वे बड़े सीधे से शब्दों में कहते हैं, धर्म हमेशा व्यक्तिगत होता है। समूह में धर्म नहीं होता, सम्प्रदाय होते हैं। संसार के सारे धार्मिक लोगों को उनका यह सवाल झकझोर कर हिलाता है, लोग बौद्ध होना चाहते हैं, बुद्ध होना क्यों नहीं चाहते हैं? लोग क्रिश्चियन बनना चाहते हैं मगर क्राइस्ट होना क्यों नहीं चाहते? सिख होना चाहते हैं मगर नानक क्यों नहीं?

जिन्हें अपने कुछ होने का बड़ा अहम होता है, उनसे वे बडी सीधी सी बात कहते हैं, नींद के 6-8 घंटे आप कुछ नहीं होते, और अगर आप 6-8 घंटे कुछ नहीं हैं तो बाकी के 18 घंटे में भी कुछ नहीं हैं। यह जो कुछ भी आपको अपने होने का एहसास है, वह सिर्फ आपका भ्रम है। जिस दिन आपको अपने वास्तविक अस्तित्व का एहसास हो जाएगा उस दिन आपका भ्रम टूट जाएगा।

भारत में सूफी और सिद्धों की ऐसी परंपरा रही है जिन्हें किसी पंथ या सम्प्रदाय में नहीं रखा जा सकता, फिर भी वे सभी पंथों और सम्प्रदायों के थे और हैं, वे सभी के और सभी उनके। काका जी भी उसी परम्परा के संत हैं। उनके व्यक्तित्व में सूफियाना अंदाज है और सिद्धों का प्रताप भी। वे भारत की आध्यात्मिक परम्परा का जलता हुआ दीया है- पूजा का दीया- जो अस्तित्व के मंदिर में जल रहा है, लोगों को अपने अन्तर दीये को जलाने की प्रेरणा देने के लिए।

एक पूजा वह होती है कि पुजारी दीया जला कर मंदिर में अर्पित कर देता है और एक पूजा वह होती है कि पुजारी अपनी पूरी सत्ता को ही आलौकित करके दीये की तरह उसे अस्तित्व के मंदिर में अर्पित कर देता है। उसकी पूरी सत्ता ही पूजा का दीया बन जाती है। काका जी ऐसी ही पुजारी हैं जो स्वयं ही पूजा का दीया होकर अस्तित्व के मंदिर में अर्पित हैं और भटके हुए लोगों को अंधेरी राहों को आलोकित कर रहे हैं। ये उनका अहोभाग्य है जो पूजा के इस जीवंत दीये की रोशनी के घेरे में है।

साधकोंके लिए सूचना :

साल 2019 का शिविर समयपत्रिका यहाँ पाए - नित्यमुक्तानंद चैरिटेबल ट्रस्ट

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