साईं काका के सम्बन्ध में

सांगली का मोहन

साईं काका का जन्म जन्माष्टमी के पवित्र दिन भारत के महाराष्ट्र राज्य के सांगली जनपद में हुआ था। उनका बचपन का नाम मोहन था और बचपन के प्रारम्भ से ही उनका रूझान आध्यात्म की ओर रहा। 3-4 वर्ष की आयु में, वो यह कहते थे कि वे उत्तरकाशी जाऐंगे और उन्हें यह मालूम ही नहीं था कि उत्तरकाशी कहाँ पर है। जबकि केवल उनके परिवार को यह पता था कि उत्तर एक दिशा का नाम है और काशी एक नगर है। उस आयु में उन्हें ऐसा प्रतीत होता था कि उनकी वर्तमान माता सरस्वती देवी पिछले जन्म में भी उनकी माता रही थीं। वह साधुओं व संतों के साथ ही रहते थे और सात वर्ष की आयु में , उन्होंने एक साधु से पूछा था कि उन्हें गुरू कब मिलेगा, और वह गुरू को कैसे पहचानेंगे। उस साधु ने जवाब दिया कि 18-20 वर्ष की आयु में तुम गुरू से मिलोगे और पहली दृष्टि में ही उसे तुम पहचान कर गुरू बना लोगे। उन्हें नहीं मालूम था कि कब और कहाँ यह प्रश्न उनके मस्तिष्क में आया और उत्तर देने वाला साधु भी उन्हें पुन: नहीं मिला।

युवा मोहन का शिरडी साईं बाबा से विशेष लगाव था और उसे ऐसा प्रतीत होता था कि वह अपने पिछले अनेकों जन्मों से शिरडी से जुड़ा हुआ है। वह अपनी पाठशाला का एक मेधावी छात्र था और इंजीनियर बनना चाहता था क्योंकि उसे गणित और विज्ञान का अच्छा ज्ञान था। उसकी अन्तरआत्मा और उसकी किस्मत कुछ अलग ही रास्ता दिखा रही थी जो आध्यात्मिक दिशा की और संकेत दिखा रहे थे। उस आयु में, वह कृष्णा नदी के किनारे पर अथवा शमशान भूमि या अपने घर की पहली मंजिल पर एकांत खोजता था। इस अल्प आयु में उसने स्वामी विवेकानंद, राम कृष्ण परमहंस तथा अरविन्द गुरूओं व अनय महान आध्यात्मिक के सम्बन्ध में पढ़ता रहता था। वह सदा से ही चाहता था कि स्वामी विवेकानन्द की भांति उसे भी राम कृष्ण परमहंस समान गुरू मिल जाए जो जीवन के परमसत्य से उसका साक्षात्कार करा दे। वह युवा था, लेकिन साथ ही वह उत्सुकता से 19-20 वर्ष की आयु की प्रतीक्षा कर रहा था, जब उसे गुरू के दर्शन होने थे। तब तक वह स्वामी स्वरूपानन्द, गुलवानी महाराज, निसर्ग दत्त महाराज तथा अनेकों संतों और साधुओं से मिलता रहा।

गुरू से मुलाकात

वर्ष 1967 में, दीवाली से अगले दिन, उसने गणेशपुरी जाने का निर्णय लिया, यह वह स्थान है जहां उसने अपने गुरू स्वामी मुक्तानन्दा से मुलाकात की। बाबा मुक्तानन्दा को देखते ही उसे अपने सपनों में आने वाली आकृतियों का आभास हो गया और समझ गया कि जिस गुरू की प्रतिक्षा वह अनेकों वर्षों से कर रहा था, वह आज उसके सम्मुख है और ये ही उसके गुरू हैं। गणेश पुरी आश्रम में बाबा की देखरेख और उनके निर्देशों के आधार पर उसने अपनी आध्यात्मिक यात्रा प्रारम्भ की और आगे के कुछ वर्षों तक बाबा के सानिध्य में रहा। बाबा का आशीर्वाद प्राप्त करने और उनसे दीक्षा लेने के लिए विश्व के अन्य देशों से भी अनेकों शिष्य का आगमन होता रहा। बाबा के निकट होने के कारण वह अनेक लोगों का प्रिय और परिचित था। इस प्रकार आश्रम में रहते हुए भी उसका पूरी दुनिया से संपर्क बना हुआ था।

मोहन से कृष्णा चैतन्य

बाबा के साथ संपर्क में आने के पांच वर्ष के बाद 1972 में मोहन ने उनसे सन्यासपूर्ण की औपचारिक ब्रह्मचर्य की दीक्षा ली और अपने आगामी जीवन को श्वेत वस्त्र धारण करते हुए मोहन ने अपना नया नाम “कृष्णा चैतन्य” प्राप्त किया। यानी मोहन कृष्णा चैतन्य बन गए। श्वेताबंर से उनके चेहरे पर एक सुफियाना अंदाज झलकने लगा। उसके उपरान्त, उन्होंने अपने आपको बाबा को समर्पित करते हुए उनकी शिक्षाओं का पालन किया। वर्ष 1979 में, 12 वर्ष की सघन साधना पूर्ण कर लेने पर, अपने गुरू के मार्गदर्शन द्वारा साधना प्रापत करते हुए तथा उनकी स्वीकृति से महान हिमालय की आगामी यात्रा प्रारम्भ की। इस यात्रा के दौरान, उन्होंने हरिद्वार में माँ आनन्दमयी से मुलाकात का अवसर प्राप्त हुआ, उसके पश्चात वे देवप्रयाग चले गए और अन्त में उत्तरकाशी पहुँचे। उत्तरकाशी, वह स्थान था जहाँ पहुँचने की उनकी अभिलाषा बचपन के समय से ही थी। जैसे ही वे वहाँ पहुँचे उन्हें अचानक ऐसा प्रतीत हुआ कि वहाँ की परिवर्तियों से वे इतने अधिक परिचित हैं कि इस पवित्र स्थल से वे पूर्ण रूप से जुड़े हुए हैं। अनायास ही वे स्मृतियों के आयाम में चले गए जहां उन्होंने देखा की पूर्व जन्म में उनका जन्म उत्तरकाशी में ही हुआ था और किसी गम्भीर बीमारी के कारण 40-42 की आयु में अपनी उस माता की गोद में उनकी मृत्यु हो गई, जो वर्तमान में भी उनकी माता हैं।

आत्मसाक्षात्कार

जिस फूल का बीज स्वामी मुक्तानन्द ने बारह साल पहले बोया था और जो उनकी सजग देख-रेख में अंकुरित भी हुआ था वह यहां सहज ही खिलने लगा। श्री चैतन्य अपने ह्रदय सरोवर में खिल रहे फूल की सुगन्ध से मदमस्त हुए जा रहे थे। वे कई घंटे ध्यान में बैठे रहते थे और एक दिन अचानक ही वह फूल पूरा का पूरा खिल गया। श्री कृष्ण चैतन्य को समाधि लाभ हुआ। उन्हें आत्मसाक्षात्कार हुआ। वे परमबोध को उपलब्ध हो गए। वे डेढ़ दिन यानी लगभग छत्तीस घंटे तक समाधि की अवस्था में रहे। जब वे दैहिक चेतना में वापस आए उन्हें काल का भान नहीं था कि वे अभी थोड़ी देर पहले ही ध्यान में बैठे थे और अभी आँख खुल गई। उन्हें काफी देरतक विश्वास नहीं हो रहा था कि उनके पास शरीर भी है। वे अपने अंग-प्रत्यंग को छू-छू कर स्पर्श कर अनुभव करने लगे। पर्वतो की जड़ता में और पेड़ पौधों में भी उन्हें आत्म चेतना का विस्तार नजर आया। वे बार-बार इस अनुभव की स्मृति पर पुलकित हो रहे थे।

गुरू के साथ एक और भेंट

परम अनुभव आत्म साक्षात्कार के बाद उन्हें अपने गुरू से मिलने की बड़ी प्रबल इच्छा जागृत हुई। लेकिन उससे पूर्व उन्होंने मां आन्नदमयी के आदेश का पालन कर लेना उचित समझा, उन्होंने चार धामों की यात्रा की। यात्रा के अन्त में, 1981 में वे एक बार फिर गणेशपुरी पहुंचे। गणेशपुरी में बाबा को देखते ही वे भावविह्ल हो गए और बाबा भी आत्मतृप्ति को उपलब्ध अपने शिष्य को देख कर आह्रलादित हुए। वे बाबा के चरणों में नतमस्तक हुए। इस मुलाकात में बाबा ने उनको कुछ विशेष और व्यक्तिगत निर्देश दिए जो उनके भावी जीवन की भूमिका से संबंधित थे। इसके बाद उन्होंने श्री चैतन्य को आश्रम में ज्यादा दिन रूकने के प्रति प्रोत्साहित नहीं किया बल्कि उन्हें अमरनाथ की यात्रा करने का निर्देश दिया। उन्हें विदा करते समय बाबा भावुक हो गए थे। बाबा की भावुकता रहस्य उन्हें अमरनाथ की यात्रा से लौटते समय उत्तरकाशी में मालूम हुआ। श्री कृष्ण चैतन्य ने अपने गुरू को इस स्थिति में पहले कभी नहीं देखा था। उत्तरकाशी में ही उन्हें अपने गुरू के देहान्त का ह्रदय-विदारक समाचार प्राप्त हुआ। गुरू ने महासमाधि ग्रहण कर ली थी और अपनी देह त्याग दी। अपने शिष्य का स्थूल शरीर को विदा करते समय गुरू को यह आभास हो गया था कि श्री कृष्ण चैतन्य से उनकी अंतिम भेंट है। गुरू की मृत्यु के इस ह्रदय-विदारक समाचार से श्री कृष्ण चैतन्य विचलित हो गए। स्वयं अस्वस्थ होने के के उपरान्त भी वह गणेशपुरी पुहंचे। उस समय उनके गालों पर अश्रु-प्रवाह निरन्तर हो रहा था और उऩ्होंने अपने गुरू की समधि पर अपना अंतिम प्रणाम प्रस्तुत किया। आश्रम में व्यतित क्षणों की स्मृतियाँ उनके मस्तिष्क में निरन्तर उमड़ती रही। माता-पिता को वे स्वेच्छा से छोड़कर आए थे लेकिन स्वयं को कभी अनाथ महसूस नहीं किया पर अब गुरू के वियोग में उन्हें अहसास हो रहा था कि वे अनाथ हो गए हैं और अन्तत: आश्रम भी हमेशा के लिए छोड़ दिया। वे पूर्णत: एक परिव्राजक जीवन जीने लगे।

श्री कृष्ण चैतन्य से काका जी

सांगली में कुछ समय व्यतीत करने के उपरान्त श्री कृष्ण चैतन्य द्वारा सम्पूर्ण भारत देश को पुन: भ्रमण आरम्भ किया गया। अब सम्पूर्ण विश्व उनका परिवार बन गया। उनके शालीनतापूर्ण तौर-तरीके तथा संवेदनशील व्यवहार से अनजान व्यक्ति भी प्रभावित हो जाता, जिसके कारण अपरिचित भी परिचित बन जाते थे। बाबा मुक्तानन्द के शिष्य सम्पूर्ण भारत में फैले हुए हैं, अतएव जहाँ भी श्री कृष्ण चैतन्य गए, उन्हें अपने गुरू भाई मिल जाते थे और उनके ही आग्रह पर श्री कृष्ण चैतन्य उनके घरों पर ठहर जाते थे। अपनी यात्राओं के दौरान वे दिल्ली भी समय-समय पर आते रहे। उनके व्यक्तित्व की वरिष्ठता और गम्भीरता इस प्रकार की थी उन्हें लोग काका जी कहने लगे। महाराष्ट्र में आदर प्रेमीजन और स्नेह के कारण उन्हें आबा जी साहब कहना आरम्भ कर दिया।

काका से साईं काका

मोहन का कृष्ण चैतन्य होना, कृष्ण चैतन्य का काका जी होना और फिर काका जी का साईं काका होना- यह भी एक रोचक कहानी है। अपने दिल्ली प्रवास के दौरान एक बार उनके गुरू भाई श्री पूरन जोशी जी ने काका जी की भारत की सुप्रसिदध्र लेखिका, कवि, साहित्कार, कहानीकार, वार्ताकार, उपन्यासकार अमृता प्रीतम से मुलाकात करवायी। दोनों ही एक दूसरे के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए। यह मुलाकात बड़ी अहसास भरी थी। अमृता जी के संवेदनशील कवि ह्रदय को काका जी की सादगी, अनुभव और ज्ञान ने मोह लिया। एक दिन का वाकया है, अमृता जी को सपने में शिरडी साईं जी के दर्शन हुए थे, वे उन्हें कहीं बुला रहे थे। शिरडी साईं के दर्शन से अमृता जी का मन भीगा-भीगा सा था और मासूम-सा सवाल भी बार-बार मुस्करा रहा था – साईं से मेरा क्या रिश्ता है, वे उसे कहां बुला रहे हैं ? उसी दौरान उनके एक दोस्त, सत्पथी जी, अमृता जी से मिलने आये। उनके सामने भी उन्होंने वह सपने वाली बात रखी । सत्पथी जी भारतीय प्रशासनिक सेवा में वरिष्ठ अधिकारी हैं और अध्यात्म में गहरी पैठ रखते हैं। सत्पथी जी ने अमृता जी से कहा, किसी दिन साईं के स्थान पर जाकर एक चादर चढ़ा दीजिएगा… ।‘ और फिर एक दिन अमृता जी साईं बाबा के स्थान पर जाने के लिए तैयार हो गयीं । दिसम्बर का महीना था, ठण्ड का मौसम था, सुबह नहाने के बाद की ठण्ड के अहसास को कम करने के लिहाज से वह घर की छत पर थोड़ी देर के लिए सुबह के सूरज की धूप में टहलने लगीं, छत के फूलों को पानी भी देती रहीं कि इतने में इमरोज़ जी ने छत पर आकर हंसते हुए कहा, “ आज बाबा बदल गया है, तू साईं के पास चली थी, पर फोन आया है कि काका जी अभी आ रहे हैं…। “ अमृता जी के मुंह से सहसा निकला , “आज साईं ने उन्हें भेजा है। ” बस उन्होंने साईं के स्थान पर जाने का इरादा बदल दिया और अपनी एक अलमारी से वह पटका, लाल सुर्ख कढ़ाई वाला पटका, जो कभी वे असम से लाई थीं, ढूंढ निकाला। असम की लोक परम्परा के मुताबिक वह पटका घर आए किसी महात्मा या आदर योग्य व्यक्ति को अर्पित किया जाता है। उसे गमछा कहते हैं। जब काका आए तो उस दिन अमृता जी ने उन्हें संबोधित किया – आइए, साईं काका और यह कह कर चाय के समय सुर्ख कढ़ाई वाला वह पटका उन्होंने, जो साईं बाबा पर अर्पित होना था, साईं काका के कन्धों पर डाल दिया, ‘ आप स्वयं इसे लेने आ गए, यह एक चमत्कार है….’ उस दिन से काका साईं काका हो गए। फिर यही साईं काका हैं जिन्होंने आने वाले बरसों में अमृता जी के सामने शिर्डी साईं से उनके रिश्ते का भेद भी खोला कि वह किसी जन्म में उनकी शिष्या रही है। अमृता जी ने अपनी नज़्मों, लेखों, किताबों व नागमणि मासिक पत्रिका में जगह-जगह पर साईं काका का जिक्र किया। आज अमृता जी का मानना है कि मेरी तलब की यात्रा में काका का मिलन महज इत्तेफाक(संयोग) नहीं था। बहुत बार ऐसा भी हुआ कि अमृता जी को साईं के संदेश काका जी के माध्यम से मिले।

ज्ञानगंज से संपर्क

उत्तरकाशी से आत्मसाक्षात्कार के परम अनुभव के बाद काका जी के साथ सामान्तर रूप से अलौकिक घटना और हुई कि उनके पास सूक्ष्म शरीरधारी कोई दो अज्ञात महात्मा आए और सूक्ष्म शरीर से ही उन्हें ज्ञानगंज ले गए। ज्ञानगंज की यात्रा काका जी के जीवन का एक रोमांचकारी परा-अनुभव है। यूं ज्ञानगंज के विषय में काका जी सार्वजनिक रूप से प्राय: मौन ही रहते हैं फिर भी बहुत आग्रह करने पर उन्होंने कुछ संक्षिप्त सी जानकारी दी है- “ तिब्बत में एक गुप्त योगभूमि है जिसका आध्यात्मिक ग्रन्थों में ज्ञानगंज, ज्ञानमठ, भूस्वर्ग, शम्बाला आदि नामों से उल्लेख मिलता है। जनसामान्य उस भूमि में प्रवेश नहीं पा सकता। जनसामान्य से मेरा मतलब जिनकी चेतना पर्याप्त विकसित नहीं है। सिर्फ उन्नत स्तर के योगी और साधक ही इस क्षेत्र में स्थूल और सूक्ष्म रूप से रहते हैं, वो ही इसमें गमन करने का अधिकार रखते हैं। पंडित गोपीनाथ कविराज के गुरु स्वामी विशुद्धानंद जी स्थूल शरीर से भी ज्ञानगंज आते जाते थे। उन्होंने सूर्य-विज्ञान वहां से सीखा था। “ज्ञानगंज का अस्तित्व तीन स्तरों पर है- आधिभौतिक, अधिवैदिक और आध्यात्मिक। वहां महात्मा भी तीन स्तरों पर रहते हैं पर वहां जो महात्मा स्थूल शरीर में भी रहते हैं वो भी सूक्ष्म, कारण, महाकारण तीनों स्तरों पर गति करने की क्षमता रखते हैं। और सूक्ष्म में रहने वाले महात्मा स्थूल में प्रकट होने की भी सामर्थ्य रखते हैं। “वहां सवांद के लिए शब्द और वाणी की जरूरत नहीं होती। शब्द और वाणी सिर्फ वैखरी तक होते हैं। मध्यमा, पश्यन्ति, परा में भाव तरंगों के माध्यम से संवाद होता है। ज्ञानगंज में कोई महापुरुष दृष्टि उठाकर देखने भर लगे तो अपने भीतर कुछ उतरता हुआ महसूस होता है। और ये भी मालूम पड़ जाता है कि क्या कहा जा रहा है। आजकल के कंप्यूटर की भाषा में कहूं तो उन भाव –तरंगों की सामान्तर डिकोडिंग भी तुरंत हो जाती है। “वास्तव में ज्ञानगंज में उपलब्ध ज्ञान की तुलना आजकल का विज्ञान सुई की नोंक के बराबर होगा। यहां वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में जो अनुसंधान कर रहे हैं वे त्रिआयामों तक सीमित हैं। तथा देश, काल व पदार्थ की परिधि में हैं। जबकि ज्ञानगंज में चौथे आयाम से भी उच्चतम आयामों पर कार्य होता है। आज का विज्ञान परमाणु से ऊर्जा बनाना तो सीख गया लेकिन ऊर्जा से परमाणु बनाने की सिद्धि नहीं अर्जित कर सकता है जबकि ज्ञानगंज में सूर्य-विज्ञान, चंद्र- विज्ञान जैसी विधाएं हैं। सूर्य विज्ञान की धारणा के अनुसार सभी तत्वों के बीच सूर्य रश्मियों में निहित है। सूर्य रश्मियों के अनुपात को बदल कर किसी भी वस्तु को दूसरी वस्तू में रूपांतरित किया जा सका है। गुलाब का गेंदा बनाया जा सकता है और गेंदा को गुलाब। सूर्य रश्मियों को संगठित करके शून्य से वस्तुएँ पैदा की जा सकती हैं। “हमारे समय के जो सिद्ध पुरूष, संत और महात्मा अब स्थूल रूप से शांत हो गए हैं, वे सब सूक्ष्म रूप से ज्ञानगंज में अभी भी विद्यमान हैं जैसे शिर्डी के साईं बाबा, संत ज्ञानेश्वर उनके दादा गुरू श्री गहनीनाथ मेरे गुरू स्वामी मुक्तानन्द, दादा गुरू भगवान नित्यानन्द, महातप: महावतार बाबा जी आदि। वे सब समय-समय पर श्रद्धालुओं और साधकों को दर्शन देते रहते हैं, परमाध्यमों से उनकी मदद करते हैं और संवेदनशील व्यक्तियों को लोक कल्याण के लिए प्रेरित करते हैं…” ज्ञानगंज की यात्रा ने काका जी की अन्तर्चेतना में एक नए आयाम के द्वार खोल दिए और ये द्वार क्या खुले कि वे स्थूल के उस पार की दुनिया के इस पार की दुनिया के लिए संदेशवाहक हो गए। वे दो अज्ञात महात्मा काका जी को प्राय: ही ज्ञानगंज ले जाने लगे। काका को उस पार के संदेश भी मिलने लगे, लोगों के लिए आदेश और निर्देश भी मिलने लगे। ये सिलसिला पिछले तकरीबन बीस साल से आज तक अनवरत जारी है।

साधकोंके लिए सूचना :

साल 2019 का शिविर समयपत्रिका यहाँ पाए - नित्यमुक्तानंद चैरिटेबल ट्रस्ट

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